अश्को की शबनमी लड़ी

दृग कोमल ढूँढ़ रहे,
अश्को की शबनमी लड़ी,
भावनाओं में जो बसती,
सुख -दुख में बूँद-बूँद बरसती।

सागर में जा मिली या,
कि सीप में मोती बनी,
आह! मैं तो नहीं पी रही,
घूँट- घूँट  घुटन भरी ।

भावनाओं की उथल- पुथल,
कहाँ गयी सुख-दुख की कोलाहल,
बोझिल पलकें हो चली,
नज़रे फिर भी शुष्क पड़ी ।

दिल का दरिया सूख चला,
सुख -दुख अब कैसे पलें,
करूण क्रंदन गरजते बादल,
सम हुए,बरसते-बरसते रूक पड़े ।
दृग कोमल ढूँढ़ रहे ,
अश्को की शबनमी लड़ी ।।

image

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

4 Comments

  1. Praveen Nigam - June 27, 2016, 9:45 pm

    nice one

  2. देव कुमार - June 28, 2016, 12:56 pm

    So NIce

Leave a Reply