ऊंचाई कितनी ही मिल जाये

ऊंचाई कितनी ही मिल जाये

ऊंचाई कितनी ही मिल जाये परिंदे को मगर,

बुझाने प्यास उसको भी ज़मीं पर आना पड़ता है।

नहीं उड़ती पतंग भी हरपल आकाश में,

उसे भी वक़्त आने पर कट जाना पड़ता है।

ना ये कर गुमां तूने पा लिया है आस्मां,

यहाँ हर शक्स को इस मिट्टी में मिल जाना पड़ता है।।

 

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

4 Comments

  1. Kavi Manohar - July 5, 2016, 11:01 pm

    Nice

  2. Praveen Nigam - July 7, 2016, 9:53 am

    behtareen

  3. राम नरेशपुरवाला - October 27, 2019, 1:04 am

    वाह

Leave a Reply