तेरी बुराईयों को हर अखबार कहता है,

तेरी  बुराईयों  को  हर अखबार कहता है,
और  तू  है  मेरे  गाँव  को गँवार कहता है.

ऐ  शहर  मुझे  तेरी सारी औकात पता है,
तू  बच्ची  को भी हुश्न-ए-बहार कहता है.

थक  गया है वो शक्स काम करते -करते,
तू  इसे  ही अमीरी और बाज़ार कहता है.

गाँव  चलो  वक्त  ही  वक्त है सब के पास,
तेरी  सारी  फ़ुर्सत  तेरा इतवार कहता है.

मौन  होकर फ़ोन पे रिश्ते निभाये जा रहे,
तू इस  मशीनी दौर को परिवार कहता है.

वो  मिलने  आते थे कलेजा साथ लाते थे,
तू  दस्तुर  निभाने को रिश्तेदार कहता है.

बडे – बडे मसले हल  करती थी पंचायते,
तू अंधीभ्रष्ट दलीलो को दरवार कहता है.

अब  बच्चे  तो बडो का अदब भूल बैठे है,
तू  इसे  ही नये दौर का संस्कार कहता है.

हरेन्द्र सिंह कुशवाह
“एहसास”

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9 Comments

  1. देव कुमार - July 6, 2016, 5:01 pm

    Bahut Achi

  2. Kavi Manohar - July 6, 2016, 5:42 pm

    Nice one

  3. Harendra singh kushwah "aihsas" (एहसास) - July 7, 2016, 12:09 am

    शुक्रिया दोस्तो

  4. Praveen Nigam - July 7, 2016, 9:52 am

    bahut badiya dost

  5. Akhileshwar - July 8, 2016, 11:21 am

    Wah wah

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