Poems

जब भी मैं तुझसे

जब भी मैं तुझसे कहीं पर मिलता हूँ,
सोचता हूँ कि कम से कम आज तो,
तेरे आँचल में सर रख कर तुझको
निहारता हूँ,
इसी तमन्ना में अक्सर मेरा तुझको यूँ ही देखना,
मेरे देखने पर तेरा शरमा कर नज़रे झुका लेना,
फिर तिरछी निगाहों से मुझे खुद पर से नज़रे हटाने को कहना
मेरा नज़रे तो हटा लेना पर, अगले ही पल,
दिल में हजारों सवालों का आ जाना,
कि,
कैसे हटा लूँ ये नज़र तेरे चेहरे पर से,
जब मेरी आँखों को सिर्फ इसी ताज से चेहरे को,
देखने की आदत पड़ गयी हैं,
चलो इन नजरों को हटा भी लिया
तो इन हाथों का क्या करूँ,
जिन्हें बस तेरे उन छोटे से कोमल हाथों के
स्पर्श की आदत पड़ गयी हैं,,
चलो इन हाथों को हटा भी लिया
तो इन क़दमों का क्या करूँ,
जो सिर्फ तेरी झरने सी आवाज सुन कर,
खुद-ब-खुद ही तुझ तक बढ़ने लगते हैं,
चलो इन क़दमों को भी थाम लिया,
तो इन होंठों का क्या करूं,
जो अक्सर मिलते हैं तो सिर्फ तुम्हारे
उस प्यारे से नाम की इबादत करने के लिए!!!
चलो इन होंठो को भी सीं लिया तो
इस दिल का क्या करूँ,
जिसके हर एक कोने में बस,
तुम ही तुम रहती हों!!!
चलो इस दिल को …………………………

“मौत” #2Liner-43

ღღ__मौत को भी आखिर, गुमराह कब तलक करते;
.
ज़िन्दगी छोड़ दी हमने, हर लम्हा तुम्हारा करके !!…….‪#‎अक्स‬

“वे”

आकाश से आती हैं जेसे ठंडी ठंडी ओस की बुंदे।

नन्हे नन्हे बच्चे आते हैं आँखे मूंदे।।

इन बूंदों को सँभालने वाली वो कोमल से पत्तियां।

बन जाती है नजाने क्यों जीवन की आपत्तियां।।

गोद में जिनकी किया इस जीवन का आगाज़ ।

लगती है नजाने क्यों कर्कश उनकी आवाज़।।

दुःख हमारे उनके आंसू,ख़ुशी हमारी उनके चेहरे की मुस्कान।

करते नही नजाने क्यों उनका ही सम्मान।।

हमें खिलाया फिर खाया हमे सुलाकर सोय थे।

खुद की उन्हें फिकर कहा थी वो तो हम में ही खोय थे।।

पता नहीं कुछ लोग किस भ्रम् में रहते हैं।

जिनके सर पर बेठे है उन्हें ही बोझ कहते हैं।।

अरे नासमझ समझदारों बिना किराय के किरायेदारों।

नीचले क्रम की ऊँची सोच वालों मुफ़्त सुविधाओं के खरीदारों।।

ओस पत्ति को ठंडक पहुंचती है न की उसपर अपना अधिकार जताती है।

पत्ति पे बने रहकर ही बूँद अपना अस्तित्व बनती है।

नीचे जो गिर गई तो मिट्टी में मिल जाती है।।

उनका दिल जो झुक गया तो उसका दिल भी दुखता है।

और उसका दिल जो दुःख गया तो पतन फिर न रुकता है।।

उन्हें कर के,खुद चैन से बेठे हो।

ह्रदय को अपने पाषाण बनाय बेठे हो।।

हम लोगों को पोषित किया,सब कुछ उनका गया फिज़ूल।

उनके दिए संस्कारों को हम गये भूल।।

गणेश जी के वो तीन चक्कर याद दिलाते हैं।

तीनो लोक उनके चरणों में आते हैं।।

जो अपने कर्मो से तुम उन्हें खुश कर पाय।

समझ लो के पूरा संसार जीत लाय।।

 

अपने माता पिता का सम्मान करें वही मनुष्य का प्रथम और परम कर्त्तव्य हैं।

प्रद्युम्न चौरे?

बारिश के मौसम मे अकसर

बारिश के मौसम मे अकसर
अदरक वाली चाय की खातिर….
हल्की सी एक “walk” लेकर…
“कॉलेज” की “कैंटीन” तक हो आते थे दोनो…
चाय क्या थी एक बहाना था
तुम्हे जी भर के देख लेने का….
और फिर अफसानों का दौर चल पड़ता
तुम बातो की ढील छोड़ती…..
और मैं किस्सों वाले “माँजे” का…
एक सिरा थाम लेता…
पतंग अच्छी ही उड़ी थी
हम दोनो के रिश्ते की….
फिर कुछ यूँ हुआ
तुम्हारी बातो का तागा कच्चा पड गया…
या मैंने ही छोड़ दिया “माँजा” शायद….
कैंटीन से दोनो एक दिन
खामोश लौट आये….
टेबल पर रखे दो गिलास…
बहुत देर तक ताकते रहे
खाली पड़ी कुर्सियो को….

लवराज टोलिया

तुम आहिस्ता से पर्दे खोल देना

तुम आहिस्ता से पर्दे खोल देना
सुबह खिड़की के….
मैं बन के धूप चौखट से तुम्हारी
छन के आऊँगा…
जब पंछी चहचायेंगे तुम्हारे घर के आँगन मे…
जरा तुम गौर से सुनना
मेरी आवाज मिलेगी…
कभी जो सर्द सा झोंका
तेरे चेहरे से टकराये….
समझना मैं हवा मे था…
तुम्हे छू कर गुजर गया….
मैं साया तेरा बन कर…
तुम्हारे साथ रहा हूँ…
मैं उन गीतो मे होता हूँ…
जिन्हें तुम गुनगुनाती हो….
मैं हर जगह रहता हूँ…
बीता नही हूँ मैं
हर मंजर मे मिलूँगा
जो मुझको देख पाओ तुम
लवराज टोलिया

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