अन्तर्मुखी हूँ मैं..!!

बन पाता है जो मुझसे
उतना योगदान मैं देती हूँ

जितनी मेरी क्षमता है
उतनी ही सेवा करती हूँ|

थक जाती हूँ जब मैं ज्यादा
बिस्तर पर पड़ जाती हूँ

फिर तो अपने आप भी मैं
कहाँ अपनी सेवा कर पाती हूँ|

दूसरों को हँसना सिखलाती
खुद चोरी-चोरी आँसू बहाती

तन्हा ही खुश रहती हूँ मैं
भीड़ में साँस कहाँ ले पाती हूँ |

हाँ, सब कहते हैं यही मुझसे
अन्तर्मुखी है तू प्रज्ञा !

बहिर्मुखी व्यक्तित्व के जैसे
प्रपंच कहाँ कर पाती हूँ |

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

  1. अंतर्मुखी हृदय की कोमल भावनाएं और उनका यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवि प्रज्ञा जी की बहुत सुन्दर रचना

New Report

Close