अपनों से दूर

अपनों से दूर हो हर इंसान
खुद को भी भूल जाता है

अपने करते हैं नित शिकायत
पराधीन कहां सुख पहुंचाता है
पारावत की तरह हर सन्देशें
पर की अंजाने को पहुंचाता है

अपने रहें आश में तड़पते
पालक को भी ठुकराता है
बीती अपनों पर तकलीफें जो
स्वयं भी भुगतना पड़ जाता है

बच्चों की जनक से करता शिकायत
निज करतूत भी न याद आता है
दुख बांटने वाले को ही मिलता है
किसी के लिए नियम न बदलता है

जिंदगी बीता दी जब सारी शायद
जीना कैसे तब जाके समझ आता है

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Responses

  1. जो व्यवहार हम अपने बड़ों से करते है ,वही बच्चों से भी मिलता है ।
    बहुत ही शिक्षा प्रद कविता है राजीव जी ।बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।

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