अपराजिता

माँ,
तुम्हारे बारे में लिखना कठिन है
या यूँ कहूँ कि ये असमर्थता समानुपातिक है
उस सहजता के जिससे तुम
मेरे मौन के पीछे छिपी गहरी उदासी पढ़ लेती हो..!!

तुम जलती रहीं निरन्तर एक दीप की तरह
मेरे जीवन के अँधेरे मिटाने को
ख़ुद के भीतर से तो खत्म चुकी हूँ कब की
पर एक तुम ही हो जिसने अब तक बचा रखा है
मुझे अपनी मुट्ठियों में..!!
क्योंकि एक स्त्री हार मान सकती है परन्तु एक माँ नहीं
मुझे विश्वास है कि तुम संजोये रखोगी
मुझे अंत तक..!!

निस्संदेह ये दुनिया एक अन्तहीन समर है
और माँ एक ‘अपराजेय योद्धा’..!!

©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
(09/04/2021)

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