अब के दशहरे

चलो ! अब के दशहरे ,
नया कोई चलन करते हैं।
भला कब तक जलाते रहें,
लकड़ी का रावण,
मन में जो बैठा है,
उसी का आज दहन करते हैं,
चलो अब के दशहरे !
नया कोई चलन करते हैं।


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7 Comments

  1. Pragya Shukla - October 21, 2020, 3:12 pm

    Nice thought

  2. Geeta kumari - October 21, 2020, 3:43 pm

    अति सुन्दर भाव एवम् प्रस्तुति

  3. Satish Pandey - October 21, 2020, 3:46 pm

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  4. Rishi Kumar - October 21, 2020, 5:59 pm

    Nice

  5. Praduman Amit - October 21, 2020, 6:19 pm

    बहुत ही सुन्दर भाव है।

  6. Suman Kumari - October 21, 2020, 11:15 pm

    बिलकुल सही सोच ।
    सुन्दर अभिव्यक्ति

  7. मोहन सिंह मानुष - October 22, 2020, 3:52 am

    आप सभी का हार्दिक धन्यवाद 🙏 🙏

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