अब के दशहरे

चलो ! अब के दशहरे ,
नया कोई चलन करते हैं।
भला कब तक जलाते रहें,
लकड़ी का रावण,
मन में जो बैठा है,
उसी का आज दहन करते हैं,
चलो अब के दशहरे !
नया कोई चलन करते हैं।

Related Articles

“रावण दहन”

दशहरे का रावण सबसे पूछ रहा है हर वर्ष देखा है मैंने स्वयं को दशहरे पर श्रीराम के हाथों से जलते हुये, सभी को बुराई…

कुछ नया करते

चलो कुछ नया करते हैं, लहरों के अनुकूल सभी तैरते, चलो हम लहरों के प्रतिकूल तैरते हैं , लहरों में आशियाना बनाते हैं, किसी की…

रावण हूं

कविता- रावण हूं ———————- रावण हूं, राम नही , राक्षस हूं, भगवान नही, अब की बार दशहरे में, पहले खुद राम बनो फिर आग लगाना…

Responses

New Report

Close