अभिलाषा

मैं कब कहता हूँ फूलों की सेज मिले,
मुझे तो कमल जैसी सुदृढ मन मिले l
जो खिलता तो कीचड़ में है,
पर दाग नहीं लगने देता दामन में l

कब कहता हूँ पीड़ा रहित जीवन मिले,
मुझे तो गुलाब जैसी जज़्बा मिले l
जो कांटों में भी मुस्कुराते रहें,
फिर भी प्यार का प्रतीक कहलाए ll

मैं कब कहता हूँ कि दूसरों की सेवा मिले,
मुझे तो रजनीगंधा जैसी सेवा भाव मिले l
जो डाली से टूटकर कहीं और सज जाए,
फिर भी खुशबू फैलाती जाए l

Rajiv Mahali


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13 Comments

  1. Prayag Dharmani - August 13, 2020, 2:16 pm

    बेहतर रचना

  2. Geeta kumari - August 13, 2020, 2:57 pm

    सुंदर भाव

  3. Satish Pandey - August 13, 2020, 3:08 pm

    वाह वाह बहुत खूब

  4. Rishi Kumar - August 13, 2020, 3:36 pm

    ✍👌👌👌👌

  5. Vasundra singh - August 13, 2020, 3:36 pm

    बहुत खूब

  6. An Ordinary Artist - August 13, 2020, 5:53 pm

    Badia

  7. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - August 15, 2020, 6:41 am

    good

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