अम्बर का एक बादल

गर्म रेत पर मैं चल रही थी,
भानु की तपिश भी मुझे खल रही थी l
तभी अम्बर में एक बादल का टुकड़ा,
छाता सा बन मुझ पर छा गया l
तपते तन-मन को आराम आ गया,
मेरी तड़प में कुछ विराम आ गया॥
………✍गीता

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Responses

  1. उत्तम पंक्तिया
    आपके लिए दो पंक्तियां
    इन पंक्तियों से लेखिका के लिए सम्मान आ गया
    इतने छोटे से बादल से सब्र, आराम आ गया

  2. बहुत ही सुन्दर भाव में अपनी कविता को प्रस्तुत किया है आपने। ज़िन्दगी में गीता जी कई मोड़ आते है। हम सब को उस मोड़  से गुजरना ही पड़ता है,राजा हो या रंक। तकदीर के आगे जोर किसका चला है। सदा खुश रहने का प्रयास करे ।

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