अलख जगा आकाश

पृथ्वी और आकाश में एक पुरुष का वास !

कण-कण जिससे व्याप्त है, जीवन, मृत्यु, प्रकाश !!

 

पूरब कोई पश्चिम कहे, पृथ्वी और आकाश !

कण-कण में मुझको दिखे, आगे पीछे  पास !!

 

कर्म मध्य वह व्याप्त है, निराकार साकार !

गुण-अवगुण से परे है, तत्व-तत्व आधार !!

 

किसकी पूजा मैं करू, किसके गाऊं गीत !

मेरे भीतर व्यापत है, मेरा प्रियतम मीत !!

 

प्यासा मूरख क्यों खड़ा, चल नदिया के पास !

पथ की चिंता छोड़ तू, दौड़ हमारे साथ !!


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4 Comments

  1. Panna - May 25, 2016, 3:40 pm

    bemisaal rachna.. _/\_

  2. Anil - May 25, 2016, 3:43 pm

    Ati sundar

  3. Sridhar - May 25, 2016, 3:59 pm

    nice one 🙂

  4. Ritu Soni - June 6, 2016, 11:11 am

    सुन्दर रचना

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