अविलंब चले आओ

अब और नहीं कर देर
देखो फैला कैसा अंधेर
और नहीं भटकाओ
अविलंब चले आओ ।
उम्मीद की कोई पून्ज नहीं
डगर कहाँ, जहाँ तेरी गुन्ज नहीं
विश्वास की डोर बढ़ा जाओ
अविलंब चले आओ ।
तेरा-मेरा कोई ताल्लुकात नहीं
भा जाऊँ, वो मुझमें बात नहीं
चाह मेरे इस हारे मन की
उम्मीद की किरण बन जाओ
अविलंब चले आओ ।


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6 Comments

  1. Geeta kumari - November 3, 2020, 7:19 am

    सुन्दर रचना

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 3, 2020, 10:21 am

    अतिसुंदर रचना

  3. मोहन सिंह मानुष - November 3, 2020, 1:25 pm

    बहुत सुंदर पंक्तियां

  4. Pragya Shukla - November 6, 2020, 7:48 pm

    बहुत सुंदर

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