आइना पूंछता है

आइना पूंछता है
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यह सवाल हर रोज
मानती क्यूं नहीं सलाह मेरा ।
चेहरा वही है
क्यूं वक्त जाया करती है मेरा ‌
निखार आएगा कैसे
वही पहली सी फितरत है तेरा ‌
ज़िद का आवरण कुछ छाया है ऐसा
अच्छाइयों पर लगा बादल घनेरा ।
कुमकुम से रौनक आएगी कब तक
अंन्तर्मन में छाया हो शक का बसेरा ।


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3 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 28, 2021, 7:53 am

    बहुत खूब

  2. Satish Pandey - January 28, 2021, 8:11 am

    बहुत सुंदर रचना

  3. Geeta kumari - January 28, 2021, 4:33 pm

    व्यथित ह्रदय की सुन्दर अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती हुई कवि सुमन जी की बहुत संजीदा रचना

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