आखिर ये है कैसा संताप

पति की गलती पुत्र की गलती
गलती करे चाहे भाई-बाप।
हर गलती पर रोए नारी
आखिर ये है कैसा संताप।।
अपराध नहीं करती कोई
एक अपराधी की बन रहती।
बस यही एक अपराध सदा
अँखियाँ आँसू भर नित सहती।।
‘विनयचंद ‘ ममता नारी की
कवच रूप जो पाकर।
निज उत्कर्ष करे न
न औरों का बने ठहर।।
वीर नहीं कायर है जग में
नारी को रुलानेवाला।
नमकहलाल बनो विनयचंद
नित नित नमक खानेवाला।।


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3 Comments

  1. Geeta kumari - November 27, 2020, 11:48 am

    नारी के सम्मान में बहुत सुंदर रचना, अति सुंदर भाव

  2. Pragya Shukla - November 27, 2020, 1:12 pm

    अबला नारी हाय तुम्हारी
    यही कहानी,
    आंचल में है दूध और आँखों में पानी…
    बहुत खूब

  3. Satish Pandey - November 27, 2020, 11:22 pm

    बहुत ही सुन्दर कविता

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