आग कहाँ नहीं होती !

( संदर्भ आपातकाल )
‘वे’
चंद लोग थे
जो, आए और
ज़ब्त करने लगे
आग के संभावित ठिकाने ।

—– रौशनी गुल कर दी
—– चूल्हे ठंडे
और, माचिस गीली ।
: सख़्त पाबंदी थी
सूरज पर भी
न ऊगने की ।

‘वे’
आश्वस्त थे
अब, आग नहीं है !
….. कहीं नहीं है !!
आदमी : गूंगा और
आक्रोश : जड़ हो गया है ।

मगर;
खुली थीं : निगाहें
हैरत से —- भय से
आग समा रही थी, उनमें
प्रतिहिंसा की लय से …..
क्या;
‘वे’, जान सके
आग का नया ठिकाना ?

25 जून 1975 की भयावह स्मृतियों को समर्पित

*****#anupamtripathi*****


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2 Comments

  1. Ashmita Sinha - June 27, 2019, 5:25 pm

    Nice poem

  2. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 12, 2019, 11:02 pm

    वाह बहुत सुंदर रचना

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