आपकी पंक्तियों से

आपकी पंक्तियों से मन हुआ गदगद हमारा,
इस तरह के स्नेह का भूखा रहा है मन हमारा।
नेह यह, आशीष यह यूँ ही रहे सिर पर हमारे,
प्रेम बढ़ता ही रहे यह चाहता है मन हमारा।
@शास्त्री जी

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जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

Responses

  1. बहुत खूब
    शास्त्री जी को समर्पित
    प्रेम और सम्मान भरी पंक्तियां…
    शास्त्री जी हमेशा बिना
    किसी पक्षपात के सबकी हौसलाअफजाई करते हैं

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