आशियाँ

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रेत का महल, पल दो पल में ढह गया।
आशियाँ अरमानों का पानी में बह गया।

तिनके जोड़कर बनाया था जो घोंसला,
बस वही, तूफानों से लड़ कर रह गया।

वह दरिया है, जो बुझा गई तिश्नगी मेरी,
सागर किनारे भी प्यासा खड़ा रह गया।

आरज़ू नहीं, आसमां से भी ऊँचे कद की,
ज़मीं का ‘देव’, ज़मीं से जुड़ कर रह गया।

देवेश साखरे ‘देव’

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13 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 16, 2019, 10:08 pm

    अतिसुंदर भाव

  2. Ashmita Sinha - November 17, 2019, 12:11 am

    Nice

  3. NIMISHA SINGHAL - November 17, 2019, 12:49 am

    Good

  4. nitu kandera - November 17, 2019, 7:39 am

    Wah

  5. Poonam singh - November 17, 2019, 5:39 pm

    Wah

  6. Abhishek kumar - November 23, 2019, 10:31 pm

    बड़िया

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