इंसान तेरे रूप अनेक

इंसान तेरे रूप अनेक
कोई ईमानदारी का प्रतीक
कोई बेमानी की मिसाल,
कोई जलता दीपक मंद करता है
कोई जलाता है मशाल,
कोई शांति का प्रतीक
कोई करता है बवाल
कोई बेशर्मी की हद पार करता है
कोई रखता है मुंह में रुमाल।
कोई निष्क्रिय रहता है
कोई करता है कमाल।
कोई खुद का ही पेट भरता है
कोई जरूरत मंद के लिए सजाता है थाल,
कोई कर्म से परिचय देता है
कोई बजाता है गाल।
कोई दूसरों के लिए
मार्ग खोलता है
कोई दूसरों के लिए
रचाता है भंवरजाल।
इंसान तेरे रूप अनेक
कभी सहेजता रिश्तों को
कभी देता है फेंक।


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14 Comments

  1. MS Lohaghat - February 10, 2021, 10:59 pm

    बहुत बढ़िया, वाह

  2. Devi Kamla - February 10, 2021, 11:01 pm

    वाह बहुत खूब

  3. Suman Kumari - February 10, 2021, 11:55 pm

    बहुत सुन्दर

  4. Geeta kumari - February 11, 2021, 7:05 am

    इंसान तेरे रूप अनेक
    कोई ईमानदारी का प्रतीक
    कोई बेमानी की मिसाल,
    कोई जलता दीपक मंद करता है
    कोई जलाता है मशाल,
    _______इंसान की यह खासियत है कि प्रत्येक इंसान दूसरे से भिन्न है इसी इन्सानी फितरत को इतने अच्छे प्रकार से समझाती हुई कवि सतीश जी की जीवन दर्शन करवाती हुई बहुत सुन्दर कविता। भाव और कला पक्ष बेहद मजबूत है,कविता पाठक को अंत तक बांधे रखने में सक्षम है

    • Satish Pandey - March 8, 2021, 11:44 pm

      कविता के भाव को समझने व सुन्दर विश्लेषण हेतु बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी

  5. bipin joshi - February 11, 2021, 4:52 pm

    very nice poem

  6. Piyush Joshi - February 11, 2021, 5:03 pm

    बहुत खूब वाह

  7. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - February 11, 2021, 7:53 pm

    बहुत खूब

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