इंसान से परमात्मा

कोई वजूद नहीं था तुम्हारा
मेरे बिना..
यूंँ ही गुमसुम बैठे रहते थे..
मैंने ही आकर तुम्हारी
जिंदगी में रंग भरे
होठों को मुस्कुराना सिखाया,
हँसना सिखाया, रोना सिखाया।
मेरी ही मोहब्बत ने तुम्हें
इंसान से परमात्मा बनाया।


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18 Comments

  1. Prayag Dharmani - August 16, 2020, 10:42 pm

    बेहतर खयाल बेहद सरल सहज अभिव्यक्ति

  2. Satish Pandey - August 16, 2020, 11:11 pm

    अतिसुन्दर

  3. मोहन सिंह मानुष - August 17, 2020, 12:33 am

    बहुत ही बेहतरीन

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - August 17, 2020, 7:33 am

    Atisunder

  5. Anu Singla - August 17, 2020, 7:42 am

    सुन्दर भाव

  6. rj veera - August 17, 2020, 9:16 am

    बहुत सुन्दर भाव है
    अच्छा लिखती हो

  7. Virendra sen - August 17, 2020, 9:43 am

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  8. Rajiv Mahali - August 17, 2020, 11:23 am

    बहुत खूब

  9. vivek singhal - August 24, 2020, 7:49 pm

    उत्तम
    रचना प्रस्तुति..
    रचना की विषय नवीन है

  10. प्रतिमा चौधरी - September 26, 2020, 3:27 pm

    अतिसुंदर

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