इक हद होती है

हर बात की आखिर
इक हद होती है

सच लगता था कभी
झूठ आज साबित हुआ
अँधेरे में थी जिंदगी
उजाले पर काबिज हुआ

भविष्य देखने का दावा
अब तो खोखला पड़ा
जिसकी हथेली थी खाली
वो ही सिंघाशन चढ़ा

लगता था कभी जंगलराज
खत्म न हो पायेगा
इक चायवाला आसमा को
जमी की हकीकत दिखायेगा

अब तो लगता असंभव
कुछ भी नहीं है यहाँ
कुछ भी मुमकिन है
ये है अपना हिंदुस्तान

उम्मीद की किरण जागी
सत्ताधारी दहशत में है
सरकारी कुर्षीधारी की अकड़
लम्बी आकस्मिक छुट्टी पर है

समर्थ की ही होती परीक्षा
नयी चुनौती आती है
असमर्थ की सुस्ती देख
मुश्किल भी शर्माती है

हिम्मतवाले से हार परास्त
एकता बढ़ती जाती है
दबे कुचलों को मिलता बल
मानवता उठती जाती है

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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Responses

  1. यथार्थ प्रस्तुत करते हुए
    जिस प्रकार आपने समसामयिक शासन
    का व्याख्यान किया और
    प्रधानमंत्री जी की अच्छाईयों को गिनाया है आपका देश प्रेम दर्शाती है और साहित्य सृजन करने की आपमें असीम क्षमता है..

  2. शासन व्यवस्था का समसामयिक यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है, राजीव जी आपने अपनी कविता में, शब्दावली भी सुंदर है । देश भक्ति की भावना को दर्शाती हुई बेहद खूबसूरत रचना ।

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