इन्सानियत कहाँ

3: इन्सानियत कहाँ
जिनसे जीवन के गुल खिले, मरते ही शूल हो गये
जिन्दगी जीने की चाह में क्यूँ, मशगूल हो गये ।।
यह ऐसी महामारी है जिसने इन्सानियत में सेंध लगाई है
अमानवीय बन बैठे हैं हम,अपनों ने नजर यूँ चुराई हैं
यह संक्रमण अपने संग वो दर्पण भी एक लाया है
छिपे चेहरे से परत-दर-परत पङी चिलमन भी हटाया है
काल के इस रूप में, सारे नाते-रिश्ते,तार-तार हो गये ।।
जिनसे—
दुश्मन भी दुश्मनी त्याज, जीवन की अंतिमयात्रा में आता है
उदाहरण- इतिहास के जयद्रधबद्ध के पन्नों में मिल जाता है
पर विधाता ने कैसी दारूण बेला, आज लायी है
मृतपङे अपनेको, छूने की जहमत ,हमने नहीं उठायी है लावारिश पङे शव, अपनों को भी अछूत हो गये ।।
जिनसे—
कोरोना का खौफ कुछ ऐसा है
सारे रिश्ते बेमानी,जीवन ही जैसे धोखा है
इसने तोङ दी,जन्मों से जुड़ी,रिश्तो की कङियो को
जीतेजी दिखलादी,अपनों से मुँह मोड़ने की घङियो को
आज अपना संस्कार,संस्कार देने वालोँ का लाङ भूलें हैं
बेगाने बन बैठे वे कंधे,बचपन में हम बैठ जहाँ झूले हैं
पङी जमी पर पथरायी आँखे,हमारी इन्सानियत की निशानी है ये
किसी के परिजनों को क़ोई और देता कफन,बदलते रिश्ते की कहानी है ये
चन्द घङियो की चाह में,कैसे संवेदनहीन हो गये।।
जिनसे—-
सुमन आर्या

3: इन्सानियत कहाँ
जिनसे जीवन के गुल खिले, मरते ही शूल हो गये
जिन्दगी जीने की चाह में क्यूँ, मशगूल हो गये ।।
यह ऐसी महामारी है जिसने इन्सानियत में सेंध लगाई है
अमानवीय बन बैठे हैं हम,अपनों ने नजर यूँ चुराई हैं
यह संक्रमण अपने संग वो दर्पण भी एक लाया है
छिपे चेहरे से परत-दर-परत पङी चिलमन भी हटाया है
काल के इस रूप में, सारे नाते-रिश्ते,तार-तार हो गये ।।
जिनसे—
दुश्मन भी दुश्मनी त्याज, जीवन की अंतिमयात्रा में आता है
उदाहरण- इतिहास के जयद्रधबद्ध के पन्नों में मिल जाता है
पर विधाता ने कैसी दारूण बेला, आज लायी है
मृतपङे अपनेको, छूने की जहमत ,हमने नहीं उठायी है लावारिश पङे शव, अपनों को भी अछूत हो गये ।।
जिनसे—
कोरोना का खौफ कुछ ऐसा है
सारे रिश्ते बेमानी,जीवन ही जैसे धोखा है
इसने तोङ दी,जन्मों से जुड़ी,रिश्तो की कङियो को
जीतेजी दिखलादी,अपनों से मुँह मोड़ने की घङियो को
आज अपना संस्कार,संस्कार देने वालोँ का लाङ भूलें हैं
बेगाने बन बैठे वे कंधे,बचपन में हम बैठ जहाँ झूले हैं
पङी जमी पर पथरायी आँखे,हमारी इन्सानियत की निशानी है ये
किसी के परिजनों को क़ोई और देता कफन,बदलते रिश्ते की कहानी है ये
चन्द घङियो की चाह में,कैसे संवेदनहीन हो गये।।
जिनसे—-
सुमन आर्या


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4 Comments

  1. Abhishek kumar - July 31, 2020, 8:06 pm

    सुंदर शब्दावली का प्रयोग इंसानियत पर बहुत ही मार्मिक सहज कविता बहुत ही सरल भाषा में कवि के द्वारा व्यक्त की गई है।

    • Suman Kumari - July 31, 2020, 9:05 pm

      बहुत बहुत धन्यवाद
      भूल बस दो बार ।

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - July 31, 2020, 9:39 pm

    उत्तम

  3. Geeta kumari - August 1, 2020, 11:28 am

    मार्मिक एवं हृदय स्पर्शी कविता

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