इश्क़ के मारा दो बेचारा

हम तो गिर कर भी संभल नहीं पाए
क्या करें चाहत की डोर ही कुछ ऐसी थी।
वो कहते रहे चिंगारी से कभी न खेलना
हम जान कर भी अनजान बने रहे
क्या करे हमारी तकदीर ही कुछ ऐसी थी
जब मिला मैं इश्क़ के जौहरी से — उसने कहा
अश्क़ न बहा ए मुकद्दर के फकीर आशिक़
जो हाल तेरा है वही हाल कभी मेरी भी थी।


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2 Comments

  1. Satish Pandey - October 20, 2020, 2:48 pm

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 20, 2020, 11:26 pm

    सुंदर

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