इश्क

जुबां की बात मत करना..
उसे आंखों में छुपा रखना…
वो चिरागे आतिश है
सुलग उठोगे।

इश्क कोई दर्द भरी शमा नहीं!
जो सिसकती रहे रात भर
और खत्म हो जाए।

इश्क कोई बांसुरी नहीं!
जो सुरीली तान बन कर
चुपचाप धीमे स्वर में बजती रहे।

इश्क कोई चांद नहीं
जिसकी मधुर चांदनी में
नहाते रहोगे
मगन होकर।
इश्क खुशबू है
दबा नहीं सकते।

इश्क चांद नहीं सूरज है
थोड़ा परवान चढ़ा
शीशे सा सब उजागर हुआ।

इश्क बांसुरी नहीं बिगुल है
जमाने भर में सुनाई देता है।।
इश्क शम्मा नहीं आतिश है
जला के खाक ना कर दे
तब तक ना पीछा छोड़ता है।

जलने में ऐसा क्या है??
इश्क एक बार तो चखना है
हर दिल ये सोचता है।

निमिषा सिंघल

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