उतार – चढा़व

दरिया के किनारों पर ख़्वाहिशे नहीं पनपती,
डूबी हुई कस्ती को कभी शाहिल नहीं मिलती |

उठना पड़ता है तल से सतह पर कुछ बयां करने को,
यूं पानी के नीचे मंजिलें आसमानों को नहीं छूती |

उतार – चढ़ाव आते हैं जीवन में, ये जीवन का हिस्सा हैं,
गर पाना हो पार इनसे तो बेफिक्र राह पर चलना है |

दुनियादारी के तानों से खुद को लज्जित न करना कभी,
घी टेढ़ी उंगली से निकलता है ये बात याद रखना सभी |

रेखा को बिना मिटाये, छोटी करना सीखा था जैसे कभी,
रुतबा अपना बढा़कर समाज में ईज्जत पाना सभी है |


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Related Posts

भोजपुरी चइता गीत- हरी हरी बलिया

तभी सार्थक है लिखना

घिस-घिस रेत बनते हो

अनुभव सिखायेगा

4 Comments

  1. Pragya Shukla - October 16, 2020, 5:45 pm

    सुंदर अभिव्यक्ति

  2. Rishi Kumar - October 17, 2020, 12:03 pm

    बहुत खूब

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 17, 2020, 5:54 pm

    सुंदर

  4. Arti Bisht - October 18, 2020, 2:44 pm

    बहुत सुंदर

Leave a Reply