उलझी-सुलझी कविता – जगा आग

अंधेरे में घिरा आकाश
ठीक वैसा
जैसा खुद पर न हो विश्वास।
तारामंडल का टिमटिमाना
ठोस निर्णय ले न पाना,
ठीक एक जैसा है,
अपनी बात पर
स्थिर न रह पाने जैसा है।
कदम उठाना
तब उठाना
जब विश्वास हो खुद पर।
अंधेरा चीरने का
संकल्प हो जब
तब कदम उठाना
अन्यथा पड़े रहना
दिवास्वप्न देखना,
नहीं नहीं
आ अंधेरा तो
मिटाना ही होगा,
रात स्वप्न देखकर
सुबह उसे
सच बनाना होगा।
जाग, खुद पर
कर विश्वास,
मन स्थिर रख,
आगे बढ़ने की जगा आग।

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

  1. आधुनिक कविता की विधा लेकर आपने जिस प्रकार मनुष्य के अविश्वास की बराबरी अंधकारमय
    आकाश से की है
    वह अपने आप में नवीन उपमा है यह सत्य ही है मनुष्य को अपने ऊपर अडिग विश्वास होना चाहिए और तभी किसी पथ पर कदम बढ़ाना चाहिए जब उसे उस पथ का ज्ञान हो किसी ने कहा है

    पाना है मंजिल तो अपना रहनुमा खुद बन
    वो अक्सर भटक गये जिन्हें सहारा मिल गया।
    👍👍👍

    1. समीक्षा स्वरूप इतने सुन्दर शब्द पाकर मन में अतीव प्रसन्नता हुई। वाह बहुत सुंदर व्याख्या। गहरी जीवनानुभूतियों से जुड़ी उलझे मनोभावों की उलझी हुई इस कविता का इतना सटीक विश्लेषण करने हेतु आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

  2. आत्म विश्वास के उपर बहुत ही सुन्दर रचना । आत्म विश्वास ही ना होगा तो मनुष्य कुछ नहीं कर पाएगा ।

New Report

Close