उषा काल की मॅंजुल बेला

उगते सूर्य की रश्मियाँ,
जब-जब पड़ी हरित किसलय पर
सुनहरी पत्तियाँ हो गईं,
देख सुनहरी आभा उनकी,
आली, मैं कहीं खो गई।
वृक्षों के बीच-बीच से,
रश्मियाँ छन-छन कर आती थीं
उषा काल की सुन्दर बेला में,
मेरे मन को भाती थीं।
उषा काल की सूर्य रश्मियाँ,
सबके भाग जगाती हैं।
कोयल भी कुहू-कुहू कर,
मीठे राग सुनाती है।
उषा काल की मॅंजुल बेला,
मन को बहुत लुभाती है।
ठॅंडी-ठॅंडी पवन बहे जब,
याद किसी की आती है॥
____✍गीता

Related Articles

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

Responses

  1. उषा काल की मॅंजुल बेला,
    मन को बहुत लुभाती है।
    ठॅंडी-ठॅंडी पवन बहे जब,
    याद किसी की आती है।
    —— अति उत्तम रचना, कवि गीता जी की लेखनी से प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत चित्रण हुआ है।

    1. उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी। आपकी दी हुई समीक्षाओं से लेखन की ऊर्जा और उत्साह प्राप्त होता है, अभिवादन सर

  2. उगते सूर्य की रश्मियाँ,
    जब-जब पड़ी हरित किसलय पर
    सुनहरी पत्तियाँ हो गईं,
    देख सुनहरी आभा उनकी,
    आली, मैं कहीं खो गई।
    वृक्षों के बीच-बीच से,
    रश्मियाँ छन-छन कर आती थीं..

    सुंदर अभिव्यक्ति

New Report

Close