ऊंचे-ऊंचे घरों में

ऊंचे-ऊंचे घरों में ,
रहने वाले लोग,
आजकल घरों में ही रहते हैं,
मगर मैं निकला हूं बाहर, साहेब !
रेहड़ी लेकर,
खाली उदर बच्चों का,
टिकने ही नहीं देता है।

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Responses

  1. बहुत सुंदर पंक्तियां
    सच यही है कि पापी पेट के लिए कोरोना दौर में भी गरीब लोगों को काम के लिए इधर उधर जाना ही पड़ता है
    बहुत सुंदर भाव

  2. बहुत ही सुन्दर ।
    एक आम आदमी की बेबसी को प्रकट करती पंक्तियाँ ।
    अपने बच्चों के पेट की भूख के आगे न कोरोना का भय
    अपने कर्तव्यों को पूरा करने निकला है जो होके अभथ

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