कठपुतली

कठपुतली तो देखी होगी ना….
हाँ, वही काठ की गुड़िया।
जिसकी डोर रहती है सूत्रधार के हाथों में,
वह अपनी उँगलियों से जैसे चाहे,
उसे नचाता है….
दर्शकों को भी आनन्द आता है।
लगता है कि उसमें जान है,
लेकिन, कहां….
वह तो बिल्कुल बेजान है।
नाचती रहती है सूत्रधार के इशारों पर केवल।
इशारों पर नाचोगे,
तो नचाएगा यह जमाना…
हे प्रभु, कभी किसी को किसी की कठपुतली न बनाना।।
_______✍️गीता

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Responses

  1. तो नचाएगा यह जमाना…
    हे प्रभु, कभी किसी को किसी की कठपुतली न बनाना।।
    —- कवि गीता जी की बहुत सुंदर रचना। बहुत सत्य कहा है आपने, उत्तम रचना

    1. सुन्दर और लाजवाब समीक्षा के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी

  2. अपनी किरदार निभाने ही पड़ेंगे
    जो लिखा हैं वो होना ही हैं
    सब मौन ना हो सकते जहां में
    कुछ कोलाहल भी जरूरी हैं
    रचना विकास कुमार

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