कब्र पर आकर

कविता- कब्र पर आकर
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दौड़ रही हूं,
इधर उधर,
ढूंढ रही हूं,
डगर डगर,
पूछ रही हूं,
नगर नगर,
कोई मुझको,
पता बता दो,
मेरे साजन का,
घर बता दो|
कहाँ बसे हो
मुझे छोड़ कर,
आओ फिर से,
मिल जायें
हो दर्शन –
अगर तुम्हारा,
सब कष्ट मेरे मिट जायें,
हंसना लड़ना
कितना अच्छा था,
जब तुम रूठे
मैंने रोज मनाए,
जब मैं रूठी,
मेरे लिए तुम
खीर पकाए,
डरते डरते
ले आते पास मेरे,
सोना सोना कहके
सौ बातों से मुझे मनाते,
अपने हाथों से मुझे,
खीर खिलाते,
ठुकरा दी जब खीर तुम्हारी,
झट आंखों में आंसू भर लेते,
मुझे पता है
मैं मिल नहीं पाऊंगी,
यह मेरा पागलपन मेरा प्यार है,
सुबह शाम कब्र पर आकर
खुद से बातें करती हूं
——————————
—-✍️ऋषि कुमार प्रभाकर–


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3 Comments

  1. Geeta kumari - January 17, 2021, 12:01 pm

    अपनी खूबसूरत यादों को समेटती हुई कविता की नायिका का बहुत ही खूबसूरत और मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है कवि ऋषि जी ने ।
    बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,उत्तम लेखन

  2. Suraj Atikaye - January 17, 2021, 12:21 pm

    Hai ho

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 17, 2021, 9:30 pm

    बहुत खूब

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