करूँ बस अपने मन का

हर रीति रिवाज से परे
करूँ बस अपने मन का।
मन कहता मेरा
जो अपमानित करते
मेरे जननी जनक का ।
उनकी पहुँच से दूर
कहीं ले जाऊँ
करूँ बस अपने मन का।
कैसी खटास यहाँ घिर आई है
हर रिश्ते में दूरियाँ उभर आई है
उसमें मिठास घोल दू अपनेपन का
करूँ बस अपने मन का।
सहनशीलता तुम्हारा आभूषण
धीरता से सीचते आई घर- आँगन
खोते जा रही आपा अपना
दोष है उम्र के अंतिम पङाव का
करूँ बस अपने मन का।


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5 Comments

  1. Geeta kumari - November 17, 2020, 6:13 pm

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. Pragya Shukla - November 17, 2020, 8:34 pm

    आपने अपने मन की बातों को कविता में बहुत अच्छे से ढाला है
    कवि की अल्हड़पन की सोंच बहुत अच्छी है

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 18, 2020, 7:56 am

    बहुत खूब

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