कविता के भाव

कविता में वो भाव नहीं हैं,
जो मैं कहना चाहूं
स्वर में वो माधुर्य नहीं है
जो तुम्हें सुना मैं पाऊं
वाणी में वो चातुर्य नहीं है
कैसे मैं समझाऊं
कविता में वो भाव नहीं है
कैसे तुम्हे सुनाऊं
फ़िर भी ना घबराऊं
मैं, मन तुम भी ना घबराना
धीरे – धीरे सीख ही लूंगी
कविता में भाव भी लाना..

*****✍️गीता


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7 Comments

  1. Pragya Shukla - October 18, 2020, 9:45 am

    At I sundar

  2. Geeta kumari - October 18, 2020, 10:28 am

    Thank you very much pragya.

  3. Satish Pandey - October 18, 2020, 5:38 pm

    कवि गीता जी की अतिउत्तम कविता। सकारात्मक विचारों की ओर प्रेरित करते हुए, सरल सहज शब्दों में उत्तम कविता है।

    • Geeta kumari - October 18, 2020, 6:13 pm

      कविता की समीक्षा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी, आपकी समीक्षा हमेशा ही प्रेरक होती हैं । बहुत बहुत आभार सर 🙏

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 18, 2020, 8:16 pm

    अतिसुंदर

    • Geeta kumari - October 18, 2020, 8:57 pm

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका भाई जी 🙏

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