कविता -मकर संक्रांति चलो मनाए |

कविता -मकर संक्रांति चलो मनाए |
मकर संक्रांति आई पतंग चलो उड़ाए |
उड़े ऊंचाई जैसे सोच पेंच चलो लड़ाये |
डोर पतंग की थाम खूब तुम रखना |
कट न जाये उम्मीदे डोर चलो बचाए |
उड़ने दो अरमानो को उंची पतंग जैसे |
गिर ना जाये जमीन जमीर चलो बचाए |
सर्दियों का मौसम ठंड है बहुत यहा |
काँपते गरीब को कंबल चलो ओढ़ाए |
दही चूड़ा तिलकुट है मजा खूब लेना |
वहा भूखे प्यासों की भूख चलो मिटाये |
अहले शुबह गंगा स्नान तुम कर लेना |
धोकर बुराई अपने पाप चलो मिटाये |
खत्म हुआ खरमास शुभ कर्म अब होगा |
है सुंदर पर्व गले अछूतो चलो लगाये |
लगा मेला संग बच्चो खुशिया मना लो |
रोते हुये बच्चे बाहो झूला चलो झुलाए |
माता -पिता बड़े बुजुर्गो भूलना नहीं |
छूकर पाँव मकर संक्रांति चलो मनाए |
श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

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