कविता-शिक्षा प्रेमी

कविता -शिक्षा प्रेमी
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हे शिक्षा प्रेमी
क्या बात कही तुमने
सच्चाई संग प्रहार किया
उतर गए कई नकाब,
बेच रहे शिक्षा को,
शहरों में खोलकर दुकान,
फीस पर फीस,
निकली जनता की खीस,
बस्ते के बोझ तले दबता बच्चा,
अच्छे नंबर के चक्कर में,
बच्चा कोचिंग करता-
कोचिंग के फीस से
मां-बाप की निकली खीस,
आलू मटर टमाटर बेचे
बेची घर की खेती भी,
फीस न पूरा होती तो यारों
बीबी बेचे मंगलसूत
नोटिस भेजे बैंक भी
कर्ज लिए हो हमसे भी,
वक्त खत्म पैसा दे दो
वरना खेती गिरवी रख दो
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—


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4 Comments

  1. Satish Pandey - December 31, 2020, 8:12 am

    बहुत खूब ऋषि जी

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 31, 2020, 9:35 am

    वाह बहुत खूब

  3. Geeta kumari - December 31, 2020, 1:09 pm

    यथार्थ परक रचना

  4. Pragya Shukla - December 31, 2020, 9:44 pm

    आपकी कविता में सत्यता है
    तथा लेखनी में जादू है

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