कविता

” मै ही तो हूँ- तेरा अहम्
…………………………..
मै ही तो हूँ
तुम्हारे अंतरात्मा में
रोम रोम में तुम्हारे |
मैं ही बसा हूँ हर पल
तुम्हारे निद्रा में जागरण में |
प्रेम में घृणां में उसांसो से
लेकर तुम्हारे उर्मियों तक |
मैं हूँ बस मैं ही हूँ
न पुर्व न पश्चात तेरा
कोई था न होगा |
एक मेरे सिवा तुम्हारे
एहसास के परिसीमन
के दायरे का कोई अंत नही.
और उस अंतहीन मर्यादा की
आखरी रेखा तक विराजमान हूँ |
मैं मेरा अस्तित्व अनादि है
कुरूवंश से लेकर प्रत्येक
विनाश की जड हूँ मैं
सृष्टि की रचना का द्योतक हूँ मैं|
अंगार हूँ श्रृंगार हूँ मै
अमृत हूँ अवतार हूँ मैं |
तुम्हारे त्याग में तपश्या में
ग्यान में अनुराग में
मैं हूँ मैं हूँ मैं ही तो हूँ |
तुम सदा सर्वदा हर सांस के साथ
मै मै मै करते रहते हो
फिर भी मुझे पहचानते नही !
तुम्हारे आज में कल में घर में
बाहर में जीवन में मृत्यु में |
मैं ही तो हूँ |
सबने त्याग दिया मानव तुझको
पर मै ने आलिंगन बद्ध रखा तुझे
प्रारंभ से प्रारब्ध तक |
मैं हूँ मैं ही तो हूँ तेरा अहंकार ||
उपाध्याय…

Related Articles

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

New Report

Close