कवि

कवि
बनना आसान नहीं,
हृदय के उद्वेगो को
माला में पिरोना कोई खेल नहीं।
झुरमुटों के जंगल से
जज्बातों को एक-एक करके बाहर लाना
कोई खेल नहीं।
जिंदगी खुली किताब ना बन जाए
संभल कर लिखना कोई खेल नहीं ।

लिखे गए हर शब्द की गहराइयों में जाकर,
हर शब्द का मतलब खोजते है,
लोग हर शब्द को तराजू में तोलते हैं।

आखिर इतना दर्द क्यू छलक रहा है लेखन में??
लगता है कोई रोग पल रहा है जेहन में!!

शब्द दर शब्द प्रेम घुला है!!
लगता है कोई सिलसिला चल पड़ा है।

भगवान को ध्यायो तो भी नहीं चूकते है!
गृहस्थजीवन में क्या मन नहीं रमता??

रमता जोगी है!!!!
ये तक सोचते है।

बेचारे कवि आखिर कहा मुंह छुपाए
क्या क्या लिखे?
क्या क्या भाव छिपाए?

अंगारों पर चलते है
हर घड़ी तुलते है
हृदय में घुलते है,
तब कहीं खुलते है।

कवि अपनी बेचारगी किस तरह जताए!!!

निमिषा सिंघल

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18 Comments

  1. Kumari Raushani - October 22, 2019, 12:45 pm

    Right di

  2. Nitin Shami - October 22, 2019, 1:24 pm

    Nice one

  3. Poonam singh - October 22, 2019, 3:04 pm

    Sahi kaha

  4. Shyam Kunvar Bharti - October 22, 2019, 4:19 pm

    bahut sunder bhaaw

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 22, 2019, 10:47 pm

    कविता तो वो 🌹 है जिसे निहारने पर शीतलता मिलती है मगर नोंचने पर काँटे चुभते हैं।
    बढ़िया विचार

  6. nitu kandera - October 24, 2019, 8:18 am

    Wah

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