कहां आ गए हैं हम।

कहां आ गए हैं हम,
जहां खामोश-सी शामें हैं।
और चुप-सा सूरज उगता है।
ना बांटता है मुस्कान,
ना रौनकें फैलाता है।


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10 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 15, 2020, 9:46 am

    सुंदर

  2. Geeta kumari - September 15, 2020, 12:35 pm

    गमगीन रचना

  3. Suman Kumari - September 15, 2020, 1:29 pm

    हाँ सब कुछ बदल गया है
    फिर भी कहाँ गिला है

  4. Pragya Shukla - September 15, 2020, 3:38 pm

    Aayhay…
    लाजवाब, जबरदस्त, बहुत खूब और कितनी तारीफ करूं बस इतना ही आता है…

  5. मोहन सिंह मानुष - September 16, 2020, 11:21 pm

    शानदार

  6. Pratima chaudhary - September 17, 2020, 8:42 am

    🙏

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