काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें…….

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काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें

देखो बता रही हैं, चादर की सलवटें।

उधड़ेगी किसी रोज सिलाई ये देखना

यूं इस तरहं जो लेकर अंगडाईयां उट्ठे।

पहले ही हो रही है, बड़ी जोर की बारिश

अब आप लगे भीगी जुल्फों को झटकनें।

तस्वीर मेरी सीने पे रखकर न सोइये

हर सांस मेरी नींद भी लगती है उचटने।

एकटक न देख लेना कहीं डूबता सूरज

मुमकिन है रात भर फिर वो शाम न ढले।

……….सतीश कसेरा

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10 Comments

  1. Payal sharma - August 16, 2015, 6:40 pm

    Going Great

  2. satish Kasera - August 16, 2015, 7:07 pm

    शुक्रिया पन्ना जी! वैसे मुझे भी लग रहा था कि मेरी पोस्ट काफी ज्यादा हो गई हैं, लिहाजा अब और पोस्ट नहीं!

    • Payal sharma - August 16, 2015, 10:53 pm

      Nahi Ji aap esa na kijiega…we love your poems..plz keep posting.

      • Panna - August 17, 2015, 8:52 pm

        I think we should encourage each other to publish and appreciate poem…since number of poet are less here right now..we should call our poet friend to join saavan and help this community to grow…than everything will look nice..even a single poem in couple of days would be fine.

  3. अंकित तिवारी - August 18, 2015, 7:25 pm

    Waaaaaah

  4. Mohit Sharma - October 14, 2015, 10:51 pm

    kya baat he..nice

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