काम ही काम

घर के काम
बाहर के काम
काम की तो जैसे
बारिश हो रही है
सुकून के कुछ पल मिल जाएं
हम भी कुछ हंसें, बोलें
ऐसी ख्वाहिश हो रही है

*****✍️गीता


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8 Comments

  1. Devi Kamla - October 18, 2020, 7:32 am

    वाह, बहुत सुन्दर रचना

  2. Satish Pandey - October 18, 2020, 7:51 am

    बहुत ही लाजवाब रचना, काम के बोझ तले दबे इंसान की सुकून की तलाश की संवेदना कवि की कलम से मुखरित हुई है। वाह

  3. Geeta kumari - October 18, 2020, 8:21 am

    इस सुंदर समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद आपका सतीश जी. कविता के भाव की बखूबी व्याख्या की है आपने .अभिवादन सर 🙏

  4. Pragya Shukla - October 18, 2020, 9:34 am

    वाह!
    ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती हैं
    ये तो हरगिज अधूरी होती हैं

    • Geeta kumari - October 18, 2020, 9:38 am

      सुन्दर समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद प्रज्ञा जी

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 18, 2020, 8:17 pm

    अतिसुंदर

    • Geeta kumari - October 18, 2020, 8:59 pm

      बहुत। बहुत शुक्रिया आपका भाई जी 🙏

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