काम ही काम

घर के काम
बाहर के काम
काम की तो जैसे
बारिश हो रही है
सुकून के कुछ पल मिल जाएं
हम भी कुछ हंसें, बोलें
ऐसी ख्वाहिश हो रही है

*****✍️गीता

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Responses

  1. बहुत ही लाजवाब रचना, काम के बोझ तले दबे इंसान की सुकून की तलाश की संवेदना कवि की कलम से मुखरित हुई है। वाह

  2. इस सुंदर समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद आपका सतीश जी. कविता के भाव की बखूबी व्याख्या की है आपने .अभिवादन सर 🙏

  3. वाह!
    ख्वाहिशें कहाँ पूरी होती हैं
    ये तो हरगिज अधूरी होती हैं

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