“किंचित ही तू मूढ़ है”

किंचित ही तू मूढ़ है
कहता मेरा मन !
क्यों फोड़ा सिर तूने
निरमोही के आंगन
निरमोही के आंगन में
फलता प्रेम कहाँ है !!
जिसको तू प्रियतम समझे
वह मोहब्बत का खुदा कहाँ है ??

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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