किसान

दो रोटी देने को तुमको,
रह जाता है भूखा वो;
दूध-दही देने को तुमको,
खा लेता है सुखा वो,
कभी बारिश कभी जाड़े में;
फसल हो जाती हैं चौपट,
माँगता है बस मेहनताना;
नहीं माँगता वो फोकट।
बेईमानी चोरी आदि से,
रहता कोसो दुर है;
चलता सन्मार्ग पर वह है,
करता मेहनत भरपूर है;
फिर भी दशा वही है उसकी,
स्तर नहीं सुधरता है
करता हैं क्यों आत्महत्या?
दुख से क्यों गुजरता है?

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12 Comments

  1. सुरेन्द्र मेवाड़ा 'सुरेश' - September 20, 2019, 4:37 pm

    अत्यंत सुंदर कविता

  2. देवेश साखरे 'देव' - September 20, 2019, 5:51 pm

    सुन्दर रचना

  3. राम नरेशपुरवाला - September 20, 2019, 8:39 pm

    वाह

  4. NIMISHA SINGHAL - September 20, 2019, 9:32 pm

    Good

  5. Poonam singh - September 21, 2019, 11:16 am

    Nice

  6. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 21, 2019, 3:03 pm

    वाह जी वाह

  7. Deovrat Sharma - September 21, 2019, 7:15 pm

    अन्नदाता की व्यथा का सटीक चित्रण .. सुंदर रचना

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