किसी अदीब को हम

किसी अदीब को हम
हस्तरेखाएं दिखाकर
पूछना चाहेंगे, क्यों की
प्यार ने यूँ बेवफाई।

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ऐसा क्यों है

चारो दिशाओं में छाया इतना कुहा सा क्यों है यहाँ जर्रे जर्रे में बिखरा इतना धुआँ सा क्यों है शहर के चप्पे चप्पे पर तैनात…

Responses

  1. “हाथों की चंद लकीरों का, ये खेल है सब तकदीरों का….”

    “तक़दीर है क्या में क्या जानूं, में आशिक हूं तदबीरों का…”

    सबके, अलग अलग दृष्टिकोण…..

  2. सर हमें पता बता देना
    हम भी जाकर हाथ दिखाएंगे
    कहीं हम पागल तो नहीं
    जो रात को सोते नहीं

    बहुत सुंदर लेखनी है आपकी

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