कुछ नहीं साथ जाता

सदा को कौन रहता है
यहां इस जमीं में
समय करके पूरा
चले जाते सब हैं।
तेरा व मेरा सभी
कुछ यहीं पर
रह जाता है
कुछ नहीं साथ जाता।
न आने का मालूम
न जाने का मालूम
बीच के ही सपनों में
होता है मन गुम।
खुली नींद
सपना जैसे ही टूटा
वैसे ही डोरों से
नाता छूटा।
जद्दोजहद सब
यहीं छोड़कर वे
सांसें न जाने
कहाँ भागती हैं।
जानते हुए सब
सच्चाइयों को
इच्छाएं मानव को
नहीं छोड़ती हैं।


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4 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 16, 2021, 8:07 am

    अतिसुंदर भाव

  2. Piyush Joshi - January 16, 2021, 8:30 am

    लाजवाब

  3. Suman Kumari - January 16, 2021, 9:38 am

    सौ फीसदी स

  4. Geeta kumari - January 16, 2021, 2:27 pm

    “न आने का मालूम न जाने का मालूम
    बीच के ही सपनों में होता है मन गुम।
    खुली नींद सपना जैसे ही टूटा
    वैसे ही डोरों से नाता छूटा।”
    जीवन के एक अलग ही दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती हुई कवि सतीश जी की बेहद गंभीर रचना, जो कुछ सोचने को मजबूर कर देती है।
    बहुत लाजवाब अभिव्यक्ति, उत्तम लेखन

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