कुछ मुझमे सीरत है तेरी

‘कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
कुछ तुझमे अब है असर मेरा..
तू रह गुज़र सी है मुझमे,
सब तुझसे ही है बसर मेरा..
कभी सफर हुआ है मंज़िल सा,
कभी हमसफर ही सफर मेरा..
कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
कुछ तुझमे अब है असर मेरा..’

‘मीलों तक सन्नाटा सा कुछ,
चादर जैसा था बिछा देखा..
तू एक हलचल का मंज़र थी,
जिसे न देखा तो क्या देखा..
कुछ मैं भी मुअत्तर हूँ तुझसे,
कुछ तुझमे भी है अत्तर मेरा..
कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
कुछ तुझमे अब है असर मेरा.. ‘

‘शुरुआत नई थी कुछ पहले,
कुछ चलते चलते वक्त गया..
तेरे साथ गुज़ारा जो लम्हां,
वो थमा नही बावक्त गया..
कुछ तेरा सीधा सादापन,
कुछ आसां नेक जिगर मेरा..
कुछ मुझमे सीरत है तेरी,
कुछ तुझमे अब है असर मेरा..’

– ‘प्रयाग’

अर्थ :-
मुअत्तर : सुगंधित
अत्तर : इत्र
आसां : सरल
बावक्त : वक्त पर

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