कैसी वेबसी

ये कैसी बेबसी है
नाराज़गी को ढो रहे हैं
अक्षमता को आकने के बदले
दूसरे की कमियों को गिन रहे हैं ।
ये दिन है कैसा
ना उम्मीदों का आसिया है
ख़्वाहिशों के जलने की
चुपचाप मातम मना रहे हैं ।
हर दुआ अपनी
जो कभी कबूल हो गयी थी
उन मन्नतो से ही
अपने अपनों से ज़ुदा हो रहें हैं ।
हर साँस में जिनकी
ख़ैरियत की ही दुआ आ रही थी
वही गैर से बनकर
इल्जामो की झङी लगा रहे हैं ।
किसको कहे अपना
अपना कहाँ अब है कोई
अपने ही इतर की
अभिनय, मन से निभा रहे हैं ।


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6 Comments

  1. Pragya Shukla - December 15, 2020, 11:37 pm

    बुरा जो देखन मैं चला
    बुरा ना मिलया कोय
    जो दिल खोजा आपनो
    मुझसे बुरा ना कोय”
    बहुत ही सत्य व स्तरीय रचना👌👌👌👌👌👌👌👌

  2. Pragya Shukla - December 15, 2020, 11:39 pm

    आशा है आप और भी खूबसूरत कवितायें हमें जल्दी ही प्रस्तुत करेंगी

  3. Praduman Amit - December 16, 2020, 4:54 am

    लोगों की फ़ितरत अगर हम समझ जाते।
    यह दिल यों न आज खून की आँसू रोते।।

  4. Geeta kumari - December 16, 2020, 11:34 am

    बहुत खूब

  5. Virendra sen - December 16, 2020, 8:41 pm

    खूबसूरत अभिव्यक्ति

  6. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 16, 2020, 10:20 pm

    बेहतरीन

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