“कोई ओर नहीं कोई छोर नहीं”

“कोई ओर नहीं कोई छोर नहीं”

मैं चाँद नहीं
वो प्रचलित तारा ध्रुव भी नहीं
मेरे दिखने का कोई दिन नहीं
पूर्णिमा नहीं अमावस्या भी नहीं
मैं कई प्रकाश वर्ष दूर
आकाश का तारा हूँ
जिसके होने का एहसास तो है
मगर जिसकी रौशनी
अब तक यहाँ पहुंची ही नहीं
वो तारा ही हूँ जो गिनती में
तो आ जाता हूँ, कभी कभार
मगर मैं उस गिनती की शुरुआत नहीं।

मैं “स्मृती में जमा” नहीं
मैं “याद में रमा” नहीं
किसी पल का विलाप नहीं
मै हूँ किसी बात का उदाहरण
मगर किसी बात का अभिशाप नहीं

मैं समंदर नहीं जो गहरा हो
मैं ताल नहीं जो ठहरा हो
मैं गिरी ओस हूँ घांस की चादर में
मैं हूँ नमी सा हवाओं में
मगर मैं आद्र नहीं मैं उष्ण भी नहीं

मैं उदय नहीं मैं अस्त नहीं
मैं दुख नहीं मैं जश्न नहीं
मैं किसी तिथी में स्पष्ट नहीं।
मैं किसी विषय का कष्ट नहीं।
मैं पर्व नहीं मैं महफ़िल नहीं
मैं वो क्षण हूँ जो पहले की
याद सा फिर ज़हन में आ जाये
मैं वो शंका भी हूँ जो ये कह दे
कि कहीं ये वही कमबख्त डेजावू तो नहीं

मैं पतझड़ नहीं सावन भी नहीं
मैं साफ़ हूँ मगर पावन नहीं
मैं सन्नाटा नहीं मैं शोर नहीं
मैं बारिश के दौरान
वो कभी कभार की धूप हूँ
मैं इंद्रधनुष सा दिख कर ओझल
जिसका कोई ओर नहीं कोई छोर नहीं

~अम्बरीश

Related Articles

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

New Report

Close