कोरोना

हाय रे कोरोना तूने क्या – क्या गजब ढाया है,
नया साल आने को है और तू अब तक सता रहा है |

क्या कुछ जतन न किया हमने तुझे मनाने को,
घर में ही कैद हो गए खुद की जान बचाने को |

विश्व की अर्थव्यवस्था तक गिर चुकी है तुझे भगाने में,
पर तूने हम मानव की सभ्यता पर किया बड़ा घाव है |

घर से स्कूल वो लंच बॉक्स का ले जाना, वो मां के हाथों से बालों का सँवरना |

सड़क पर स्कूल की गाड़ी का आना और स्कूल पहुंच कर वो दोस्तों का मिलना, अब मानो लगता है सब सपना सा |

वो परीक्षा कक्ष में शामिल होना,
स्वतंत्रता दिवस का हर्षोल्लास से मनाया जाना
वो गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होना और भाषण से उत्सव को मनाना, मानों सब भूल गए हैं |

अध्यापक – अध्यापिका भी जैसे अब दिखने दुस्वार हो गए हैं,
मीनाक्षी मैम भी अब ६ इंच की मोबाइल स्क्रीन पर सिमट चुकी हैं |

हे कोरोना, हम इंसान अपनी मस्ती में पर्यावरण को भूल चुके थे,
तूने हम सब के बीच आकर हमें हमारे कर्तव्य से परिचय कराया है |

निवेदन करते हैं हाथ जोड़कर अब कोरोना तुमसे हम, फिर से जीना चाहते हैं |

सबक मिल चुका है जीवन में, अब फिर से मुस्कराना चाहते हैं |


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3 Comments

  1. Geeta kumari - November 26, 2020, 4:56 pm

    कोरोना की बीमारी के बारे में समसामयिक यथार्थ चित्रण

  2. Pragya Shukla - November 26, 2020, 5:09 pm

    सुंदर अलंकारों और शब्दों से सुसज्जित वर्तमान समाज पर परिलक्षित रचना

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 27, 2020, 10:51 am

    सुंदर

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