” क्या; यह सच नहीं ! “

“ यादों की यलगार “

नहीं आती याद तुम्हारी !
गोयाकि ; भूला भी नहीं मैं : तुम्हें !!

मंडराती रहीं कटी पतंग-सी : तुम !
मेरे मन के आँगन मेँ : गुमसुम !!
तुम्हें पाने के लिए भागता रहा : मैं
मर्यादा की मुंडेर तक
गिरने से बे—–ख़बर

एक
एक
कर

चुरातीं रहीं तुम —- मेरे सपने
अपने सपनों मेँ घोलकर
सोतीं रहीं; मीठी नींद : रात—भर

“मैं ; उम्र—भर जागता रहा ………..
तृष्णा लिए भागता रहा …………..”

कहाँ से लाऊं —– तुम्हारे सपने ?
लाया भी; तो —- कैसे बनाऊँ अपने ??

मेरे माथे की; ‘भाग्य—रेखा’ से, मिटाकर नाम
ऊकेर दी गईं; तुम !
किसी अजनबी हथेली पर
: ‘जीवन—रेखा’ की तरह
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6 Comments

  1. Niranjan Pandey - August 24, 2016, 5:56 pm

    bahut khoob sir ji

  2. Shivam Roshan - August 26, 2016, 11:15 am

    behtareen ji

  3. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 12, 2019, 11:10 pm

    बहुत सुंदर

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