“क्यों करता है मन को कलुषित”

क्यों करता है मन को कलुषित
भरकर ह्रदय में विष का सागर
प्रेमबीज बो कर ही,
उगता है एक वृक्ष धरा पर ।
वृक्ष धरा पर उगकर देता सुंदर फल है,
उसे सींचता सदा ही अविरल निर्मल जल है।।

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Responses

  1. आपकी सराहना के लिए
    मेरे पास शब्द नही हैं
    कवि हो तो आप जैसा
    वाह प्रज्ञा जी !
    क्या शब्द सागर है आपका,
    सुंदर शिल्प तथा हृदय तक
    जाते भाव.
    एक अच्छी कविता के सभी गुण हैं
    पाठक के मन को छूने वाले भाव…

  2. उच्च भाव व संवेदना से ओत प्रोत
    है आपकी यह कविता
    बहुत ही सुंदर है

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