क्षेत्रपाल

क्षेत्रपाल

सूखी धरती की देख दरारें
भृकुटी पर बन गयी मेरी धराये।
नित नवीन चिन्ता में रहता हूं
सब सहता हूँ चुप रहता हूँ।
सलिल की एक बूँद की खातिर
नित मेघों को निहारता रहता हूँ।
समझ बिछौना वसुन्धरा को
अम्बर के नीचे रहता हूँ।
रज की खुशबू धर ललाट
मैं चन्दन तिलक समझता हूँ।
धरती का सीना चीर मैं उसमे फ़सल उगाता हूँ
अपने स्वेद से सींच उसे मैं जीवन्त बनाता हूँ
यूँ ही नही मैं धरा पुत्र,क्षेत्रपाल कहलाता हूँ।।

अभिषेक शुक्ला
सीतापुर

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7 Comments

  1. देवेश साखरे 'देव' - October 29, 2019, 12:56 pm

    सुन्दर रचना

  2. Kumari Raushani - October 29, 2019, 1:44 pm

    उम्दा

  3. Poonam singh - October 29, 2019, 4:07 pm

    Good one

  4. NIMISHA SINGHAL - October 29, 2019, 5:47 pm

    Bhut khub

  5. nitu kandera - October 30, 2019, 11:29 am

    Wah

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