**खुदखुशी**

चोरी से चुपके से
तुम सब कुछ देखा करते हो
मैं जानती हूँ तुम ऑनलाइन भी रहते हो
जाने क्या बैठ गया है तुम्हारे मन में !
पास होकर भी तुम मुझसे
कटते रहते हो
मैं जानती हूँ, समझती हूँ सबकुछ
सुंशात राजपूत’ की तरह
तुमने भी खुदखुशी करने की सोंची है
जरा ये भी तो सोंचो सुशांत की
कहानी कहाँ तक पहुंची है
क्या तुम मुझे भी रिया चक्रवर्ती, दिशा की तरह
बदनाम कर देना चाहते हो ?
बनी बनाई इज्जत को नीलाम
कर देना चाहते हो ?
तुम्हारे घरवाले बिठायेंगे मुझे थाने में
क्या तुम यह सह सकोगे सपनें में !
तुम्हारी खुदखुशी से किसी को
क्या मिल जाएगा ?
बल्कि मेरा दर्द और बढ़ जाएगा
हम तो किसी को मुह भी नहीं दिखा पाएगे
सबकुछ छोंड़कर तुम्हारे पास आ जाएगे..


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4 Comments

  1. Geeta kumari - November 20, 2020, 3:04 pm

    खुदकुशी करना बहुत बुरी बात है, यही संदेश देने का प्रयास करती हुई कवियत्री प्रज्ञा जी की एक मार्मिक रचना

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 21, 2020, 8:23 am

    सुंदर रचना

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